*भीलवाडा शहर के प्रशासन ओर सिस्टम पर उठते सवाल * *डेनिम प्लांट या डेथ केबिन ! सिस्टम का दम घोंटता सच*
भूपेन्द्र सिंह पंँवार /नेशनल न्यूज़ टुडे 24X7
*भीलवाडा।शहर मे हो रही घटनाओं पर मशहूर ब्लॉगर *✍️सुरेन्द्र चतुर्वेदी के नजरिये से* *भीलवाड़ा! जिसे देश की “कपड़ा नगरी” कहा जाता है, अब धीरे-धीरे “क़फ़न नगरी” बनती जा रही है। ताज़ा मामला रायसिंहपुरा स्थित डेनिम प्लांट का है, जहाँ फैक्ट्री की केबिन में दो युवा श्रमिक संदिग्ध हालात में दम तोड़ देते हैं और सिस्टम हमेशा की तरह दम साधे खड़ा रहता है। यह कोई दुर्घटना नहीं, यह संरचनात्मक हत्या है।*
*रात में बिजली फॉल्ट आता है ! बॉयलर चालू रहता है ! केबिन बंद रहती है और भीतर मौजूद मजदूर बाहर नहीं निकल पाते।*
*सवाल सीधा है: केबिन में ऑक्सीजन का इंतज़ाम कहाँ था❓सुरक्षा प्रोटोकॉल किसने साइन किए थे❓बॉयलर विभाग, फैक्ट्री प्रबंधन, श्रम विभाग—सब एक-दूसरे की ओर उंगली कर रहे हैं, जबकि ज़मीन पर दो लाशें पड़ी हैं।*
*यह भी अजीब संयोग है कि पुलिस और क्षेत्रीय विधायक की मौजूदगी में आठ घंटे ‘समझौता वार्ता’ चलती है, और उसके बाद पोस्टमॉर्टम निपटा दिया जाता है।*
*सवाल उठता है कि क्या मौत का कारण तय करने से पहले सौदे तय हो गए❓अगर यह दम घुटने से मौत है, तो यह हादसा नहीं, लापरवाही का अपराध है। और अगर नहीं, तो जांच की ईमानदारी कहाँ है❓*
*कपड़ा उद्योग में हादसे अब अपवाद नहीं रहे! नियम बन गए हैं। हर चौथे दिन कोई न कोई हादसा और हर हादसे के बाद वही रटी-रटाई भाषा: “जांच होगी”। जांच होती भी है तो कागज़ों में। सुरक्षा उपकरणों की सूची चमकती है, ज़मीन पर मज़दूर नंगे दम से काम करता है। प्रोसेस हाउस और डाइंग हाउस का जहरीला वातावरण पर्यावरण और जीवित प्राणियों—दोनों का दुश्मन बना हुआ है, फिर भी प्रदूषण नियंत्रण मंडल नींद में है या मिलीभगत में यह स्पष्ट नहीं, पर जिम्मेदारी उसी की मानी जाती है।*
*…..और सवाल सिर्फ़ इस मौत तक सीमित नहीं। क्यों फैक्ट्री और बॉयलर विभाग संदिग्ध नहीं बनाए गए❓ क्यों प्रथम दृष्टया एफआईआर में कठोर धाराएँ नहीं जोड़ी गईं❓ क्यों सुरक्षा ऑडिट की रिपोर्टें सार्वजनिक नहीं हुई ❓जब तक ये सवाल हवा में रहेंगे, तब तक केबिनें डेथ-चैम्बर बनी रहेंगी।*
*इसी शहर में, कलेक्ट्रेट के बाहर युवती के अपहरण की आग ठंडी नहीं पड़ी थी कि अगले दिन पिछवाड़े एक युवती का क्षत-विक्षत शव मिल जाता है।एक महीने बाद भी शिनाख्त नहीं, दुर्गंध नहीं—यह भी रहस्य। क्या प्रशासन को अब सिर्फ़ रहस्यों की फाइल जमा करनी है, या जवाबदेही की शुरुआत करनी है❓*
*साफ़ कहा जाए तो भीलवाड़ा में मौतें अब ख़बर नहीं रहीं, रूटीन बन गई हैं। फैक्ट्रियों के गेट पर सुरक्षा के पोस्टर हैं, भीतर ऑक्सीजन नहीं। प्रशासन के पास बयान हैं, संवेदना नहीं। और व्यवस्था के पास समय है—पर न्याय के लिए नहीं।❌*
*अगर इस मामले में फैक्ट्री प्रबंधन पर गैर-इरादतन हत्या की धाराएँ, बॉयलर व श्रम विभाग की जवाबदेही तय, स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट और सार्वजनिक रिपोर्टिंग नहीं होती तो मान लीजिए, अगली केबिन में फिर कोई दम तोड़ेगा। और तब भी हम यही कहेंगे “जांच होगी।”*
Author: Vinod kumar Teli
Rajasthan Head and Reporter Kekri Ajmer
