*कुटुम्ब से राष्ट्र तक : श्रीमद्भगवद्गीता और संघ की जीवन-दृष्टि* नेशनल न्यूज़ टुडे 24X7
— डॉ. बृजेश कुमार साहू

*कुटुम्ब से राष्ट्र तक : श्रीमद्भगवद्गीता और संघ की जीवन-दृष्टि*
— डॉ. बृजेश कुमार साहू

आज जब आधुनिकता की आंधी में पारिवारिक संबंधों की जड़ें डगमगाने लगी हैं, जब तकनीक ने संवाद को सीमित कर दिया है और जीवन की गति ने साथ बैठने के क्षणों को दुर्लभ बना दिया है — तब भारतीय संस्कृति की यह पुकार सुनाई देती है कि “परिवार केवल संबंधों का समूह नहीं, वह संस्कारों का विद्यालय है।” इसी सत्य को श्रीमद्भगवद्गीता ने हजारों वर्ष पूर्व प्रतिपादित किया था, और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उसे व्यवहार में उतारने का कार्य किया है।गीता का संदेश केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं, वह जीवन-क्षेत्र के प्रत्येक मोड़ पर हमारे आंतरिक और सामाजिक संतुलन की आधारशिला रखता है। वहीं संघ अपने संगठनात्मक जीवन के माध्यम से गीता के कर्मयोग और लोकसंग्रह को “संस्कारयुक्त कुटुम्ब” के रूप में मूर्त करता है
गीता में कुटुम्ब का तात्त्विक दृष्टिकोण – कुरुक्षेत्र के मध्य अर्जुन का मोह वस्तुतः कुटुम्ब-बंधन का ही प्रतीक है। जब वह कहता है —
“दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।” (गीता 1.28)
वह परिवार के प्रति आसक्ति और नैतिक द्वंद्व के बीच उलझा हुआ है।

श्रीकृष्ण उसे सिखाते हैं कि कुटुम्ब का अर्थ केवल रक्त-संबंध नहीं, बल्कि कर्म, कर्तव्य और लोकसंग्रह से जुड़ा व्यापक परिवार है।
गीता का यह दृष्टिकोण “वसुधैव कुटुम्बकम्” की ओर संकेत करता है ।
“यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।” (गीता 3.21)
अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष का आचरण ही परिवार और समाज की दिशा तय करता है।
यहाँ ‘श्रेष्ठ पुरुष’ का अर्थ केवल राजा या वीर से नहीं, बल्कि हर परिवार के अग्रज, पिता, माता और गुरु से है, जिनके आचरण से संस्कार प्रवाहित होते हैं।गीता का यह तात्त्विक दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि कुटुम्ब का स्थायित्व ‘कर्तव्य और संयम’ से बनता है, न कि अधिकार और स्वार्थ से । वर्तमान युग में परिवार यांत्रिकता का शिकार हो गया है।संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है।परिवारिक निर्णयों में संवाद की जगह तकनीक और अहंकार ने स्थान ले लिया है। भौतिक उपलब्धियों के बीच सहजीवन का भाव कमज़ोर हुआ है।
यह स्थिति केवल सामाजिक संकट नहीं, बल्कि संस्कारिक क्षरण का संकेत है। यही कारण है कि आज भारतीय समाज में परिवारिक एकता और मूल्य शिक्षा का पुनर्संस्थापन अत्यावश्यक है।

संघ का कुटुम्ब दृष्टिकोण : गीता के कर्मयोग की सामाजिक परिणति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वतंत्रता के बाद के भारत में जिस प्रकार “परिवार” को समाज-निर्माण की मूल इकाई माना, वह गीता के कर्मयोग का व्यवहारिक रूप है। संघ का दृष्टिकोण यह है कि संस्कारयुक्त कुटुम्ब ही समरस समाज और सशक्त राष्ट्र की नींव है।”
संघ के “परिवार प्रबोधन,संस्कार वर्ग, गृहसंस्कार अभियान” जैसे उपक्रम गीता के “लोकसंग्रह” के सिद्धांत को मूर्त करते हैं।
डॉ. मोहन भागवत का कथन स्मरणीय है  घर ही पहला शाखा स्थल है, जहाँ संस्कारों का आरंभ होता है।”संघ के स्वयंसेवक जिस निष्काम भाव से समाजसेवा में लगे रहते हैं, वह गीता के इस उपदेश का जीवंत उदाहरण है “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” (गीता 2.47)
इस प्रकार, संघ का कुटुम्ब दृष्टिकोण गीता के कर्मयोग को पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर स्थापित करता है।
गीता और संघ की दृष्टियों का समन्वय तत्व श्रीमद्भगवद्गीता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
मूल आधार कर्तव्य और लोकसंग्रह संस्कार और समरसता
उद्देश्य आत्मोन्नति से समाज कल्याण परिवार से राष्ट्र निर्माण
पद्धति निष्काम कर्मयोग संगठनात्मक जीवन दृष्टि सार्वभौमिक “वसुधैव कुटुम्बकम्” राष्ट्रीय व सांस्कृतिक एकात्मता
दोनों का मूल भाव एक ही है — मानव में कर्तव्यबोध और समाज में समरसता । कुटुम्ब का सांस्कृतिक पुनर्निर्माण-
आज जब सामाजिक विघटन और पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ रही है, तब गीता और संघ दोनों हमें “संवाद” और “संस्कार” का सूत्र देते हैं।
• गीता कहती है — कर्म में समत्व और त्याग रखो।
• संघ कहता है — परिवार में प्रेम, सहयोग और अनुशासन रखो।

यदि प्रत्येक घर में यह समन्वय स्थापित हो जाए, तो परिवार केवल निवास का स्थान नहीं रहेगा, बल्कि वह राष्ट्र पुनर्जागरण की प्रयोगशाला बन जाएगा।
गीता का कुटुम्ब-दर्शन हमें सिखाता है कि परिवार केवल आर्थिक या जैविक संस्था नहीं, बल्कि धर्म और कर्तव्य का क्षेत्र है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उसी गीता-दर्शन को व्यवहार में उतारकर “संस्कारयुक्त, समरस, और आत्मनिर्भर परिवार” के रूप में आधुनिक भारत का नया स्वरूप गढ़ रहा है।

इस युग में जब समाज पश्चिमी उपभोक्तावाद के प्रभाव में अपने पारिवारिक संस्कार खोता जा रहा है, तब गीता और संघ दोनों एक ही संदेश देते हैं “कर्तव्य से ही कुटुम्ब टिकेगा, और कुटुम्ब से ही राष्ट्र खड़ा होगा।”

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